यमक अलंकार के 100 उदाहरण 

यमक अलंकार के 100 उदाहरण ?

प्रश्न-यमक अलंकार की परिभाषा देते हुए उदाहरण लिखिए ?
अथवा 
यमका अलंकार की परिभ्षा लिखिए और एक उदाहरण भी दीजिए ?

उत्तर-जिस कविता में कोई शब्द एक या एक से अधिक बार आये और उसके अर्थ अलग-अलग हों, तो उसे यमक अलंकार कहते हैं।

उदाहरण-1.

सारंग ले सारंग उड़ा, सारंग तडफा जाए 

सारंग ने कहीं बोल दिया तो, सारंग छूता जाए “।

इस पंक्ति में सारंग शब्द पाँच बार आये हैं लेकिन शुरू के तीन सारंग के अलग-अलग अर्थ हैं -इसे ऐसे समझाते हैं, सारंग का अर्थ मोर है, सारंग का अर्थ  साँप है और सारंग का अर्थ बादल है। अर्थात् सारंग (मोर ) सारंग (साँप) को अपनी चोच में दबा कर उड़ता है बादल छाये हुए हैं तो सारंग (बिजली) कड़कती है तो अगर मोर बोलेगी तो उसकी चोंच से साँप छूट जायेगा। 

उदाहरण-2.

“काली घटा का घमंड घटा”।
(एक घटा का अर्थ है – बादल, दूसरे घटा का अर्थ है – कम हो गया) 

उदाहरण-3.

“कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाय बौराए जग, या पाए बौराए”।

1.कनक = सोना

2.कनक = धतूरा

उदाहरण-4.

“माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर”।

1.मनका = माला का दाना

2.मनका = मन/हृदय

उदाहरण-5.

“तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं”।
1.बेर = तीन बार

2.बेर = फल

उदाहरण-6.

“तौं पर वारौं उरबसी, सुन राधिके सुजान।
तू मोहन के उर बसी ह्वै उरबसी समान”।

1.उरबसी = अप्सरा

2.उर बसी = हृदय में बसी

उदाहरण-7.

“जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं”।
1.तारे = उद्धार किया

2.तारे = सितारे

उदाहरण-8.

“कहै कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लीनी”।
(बेनी = कवि का नाम, बेनी = चोटी) 

उदाहरण-9.

“पच्छी परछीने ऐसे पर छीने बीर।
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के”।

(पर = पंख/लेकिन, बर = पति/श्रेष्ठ) 

उदाहरण-10.

“ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वारी,
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहती हैं”।

(मन्दर = महल, मन्दर = पर्वत) 

उदाहरण-11.

“सजना है मुझे, सजना के लिए”।
(सजना = श्रृंगार करना, सजना = प्रिय/पति) 

उदाहरण-12.

“सारंग ले सारंग चली, कर सारंग की ओट।
झीनी सारंग देखकर, सारंग करि गई चोट”।

(सारंग = दीपक/साड़ी/हवा आदि विभिन्न अर्थ) 

उदाहरण-13.

“रती-रती सोभा सब रती के सरीर की”।
(रती = थोड़ा-थोड़ा, रती = कामदेव की पत्नी) 

उदाहरण-14.

“हर लो, हे हर मेरी पीर”।
(हर = दूर करना, हर = भगवान शिव) 

उदाहरण-14.

“भजन कह्यौ ताते भज्यौ, भज्यौ न एको बार।
दूरि भजन जाते कह्यौ, सो तू भज्यौ गँवार”।

(भज्यौ = भागा, भज्यौ = भजन किया) 

उदाहरण-15.

“कबीर सोई पीर है,

जो जाने पर पीर”।
(पीर = संत, पीर = पीड़ा) 

उदाहरण-16.

“पानी गए न ऊबरै,

मोती मानुष चून”।
(पानी = चमक/आदर, पानी = जल)

उदाहरण-17.

“यह बाँसुरी की धुनि कानि परै,

कुल कानि हियो तजि भाजति है”।
(कानि = कान, कानि = लाज/मर्यादा) 

उदाहरण-19.

“नव पलाश-पलाश-वनं पुरः”।
(पलाश = पत्ते, पलाश = वृक्ष) 

उदाहरण-20.

“पाट-पाट शोभा-श्री,

पट नहीं रही है”।
(पाट = स्थान, पट = वस्त्र/परदा) 

उदाहरण-21.

“जितने तुमने तारे,

उतने नहीं गगन में तारे हैं”।
(तारे = उद्धार किया, तारे = सितारे) 

उदाहरण-22.

दीर्घ श्वास न ले दुःख में, सुख होता अनमोल।
दई-दई क्यों रोत है, दई-दई सब कबूल।।

शब्दार्थ:

  1. दई = बार-बार / ‘व’

  2. दई = हे ईश्वर / विधाता द्वारा दिया गया

व्याख्या:
यहाँ ‘दई-दई’ शब्द की पुनरावृत्ति भिन्न अर्थों में हुई है। एक स्थान पर इसका अर्थ ‘बार-बार’ है, दूसरे स्थान पर ‘हे ईश्वर’ अथवा ‘विधाता द्वारा दिया गया’। भाव यह है कि ईश्वर द्वारा दिया गया दुःख स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि दुःख के पश्चात ही सुख का आगमन होता है। (श्लेष/यमक)


उदाहरण-23.

सारंग ले सारंग चली, सारंग पूरन आय।
सारंग धरि सारंग तट, सारंग छवि लुभाय।।

‘सारंग’ के विभिन्न अर्थ:

  1. घटा (मेघ)

  2. सुन्दरी

  3. वर्षा

  4. वस्त्र

  5. घड़ा

  6. सरोवर

व्याख्या:
‘सारंग’ शब्द की बार-बार आवृत्ति हुई है और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न है। कहीं वह घटा है, कहीं सुन्दरी, कहीं वर्षा या सरोवर। बहुअर्थक प्रयोग से काव्य में चमत्कार उत्पन्न हुआ है। (श्लेष अलंकार)


उदाहरण-24.

तीन बेर खाती थी, वे तीन बेर खाती हैं।

व्याख्या:
पहले ‘बेर’ का अर्थ ‘बार’ (तीन बार) है, जबकि दूसरे ‘बेर’ का अर्थ ‘फल’ है। एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से अलग-अलग अर्थ प्रकट हुए हैं। (यमक अलंकार)


उदाहरण-25.

लाल दुपट्टा मलमल का,
दिल मेरा मल-मल गया।

(मलमल = कपड़ा, मल-मल = बार-बार मसलना/व्यथित होना) — यमक


उदाहरण-26.

लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।

(लाल = प्रिय/पुत्र, लाल = लाल रंग) — श्लेष


उदाहरण-27.

आओ सखि! सावन विरह सरसावन,
बरसत नयनन सलिल चहुँ ओर।

(सावन = वर्षा ऋतु, सरसावन = सरस करने वाला) — यमक


उदाहरण-28.

बरन देहु वज्र सम, हमें वरन देहु ब्रजराज।

(बरन = वर्णन/स्वीकार, वरन = वर देना) — श्लेष


उदाहरण-29.

माला फेरत युग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर।।

(मनका = माला का दाना, मनका = मन) — श्लेष


उदाहरण-30.

ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वारी,
ऊँचे घोर मन्दर में वास।

(मन्दर = महल, मन्दर = पर्वत) — श्लेष


उदाहरण-31.

लहर-लहर यदि चूमे तट को,
किंचित मत हो विचलित।

(लहर = तरंग, लहर-लहर = बार-बार) — यमक


उदाहरण-32.

शिवतट शिवमय शुभ सदन, शिव-शक्ति का धाम।
शिव-भाव लेकर मन रचे, शिव-नाम का गान।।

(‘शिव’ शब्द की पुनरावृत्ति) — अनुप्रास/यमक


उदाहरण-33.

शिव-विधि से शिवार्चन किया, शिव-चाह से आह्लाद।
शिव-गान गाते लौट गए, निज गृह और प्रासाद।।

(शिव शब्द की आवृत्ति) — यमक/अनुप्रास


उदाहरण-34.

बरजीते सर मैन के, ऐसे देखे मैं न।
हरिनी के नैनन ते, हरिनी के ये नैन।।

(हरिनी = मृगी, हरिनी = स्त्री) — श्लेष


उदाहरण-35.

कुमुदिनी मानस मोदिनी कही।

(कुमुदिनी = कमलिनी, मोदिनी = आनंद देने वाली) — अनुप्रास


उदाहरण-36.

बरनत बरन प्रीति बिलगाती,
ब्रह्म-जीव सम सहज मिलाती।।

(बरनत = वर्णन करना, बरन = रंग/वर्ण) — श्लेष


उदाहरण-37.

पत्ते-पत्ते में तुमको देखा,
डाली-डाली पर दृष्टि डाली।।

(डाली = शाखा, डाली = डालना) — यमक


उदाहरण-38.

जगमग-जगमग जग का मग,
प्रति पग ज्योति से जगमग।।

(जग = संसार, जग = प्रकाशित करना) — यमक/अनुप्रास


उदाहरण-39.

सोच में डूबी साँसें ठंडी खिंची,
फिर झट गुल कर दिया दिया, आँखे मिंची।।

(दिया = दीपक, दिया = देना) — यमक


उदाहरण-40.

पक्षी पर छीने ऐसे, पर पर छीने वीर।
तेरी बरछी ने बर छीने, खल दल के अधीर।।

(पर = पंख/किन्तु, बर = श्रेष्ठ/पति) — श्लेष

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अलंकार

यमक अलंकार

डॉ. अजीत भारती

By hindi Bharti

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