Surdas ke pad SummarySurdas ke pad Summary

Surdas ke pad Summary? आज हम पाठ को सार के माध्यम से कम समय में आसानी से सीखेंगे ।

NCERT Book CBSE Class 10, विषय-हिंदी-अ, क्षितिज-2, कव्यखंड

पाठ-सूरदास के पद

पाठ का सार (Summary)

पाठ में कुल चार पद हैं- इन पदों में सूर ने कृष्ण के प्रति गोपियों के सच्चे प्रेम को प्रकट किया है। जब कृष्ण वृन्दावन को छोड़कर कंस का वध करने के लिए मथुरा चले जाते हैं और वापस नहीं आते हैं, तो गोपियाँ उनके वियोग में व्याकुल हो जाती हैं। कृष्ण को जब यह समाचार मिलता है तब वे अपने ज्ञानी मित्र ऊधौ को गोपियों के पास उन्हें समझाने के लिए भेजते हैं। लेकिन ऊधौ का सामना जब गोपियों से होता है तब कैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं? आओ इसे चारो पदों के मध्यम से एक-एक करके समझने की कोशिश करते हैं –


भाग-1

पहले पद में गोपियाँ ऊधौ पर व्यंग्य करती हुई कहती हैं कि तुम तो बहुत ही भाग्यशाली हो जो किसी के प्रेम में नहीं पड़े।तुम्हारी तो दशा कमल के पत्ते और तेल की गगरी जैसी है। जो पानी के संपर्क में आकर भी एक-दूसरे के प्रभाव से बचे रहते हैं। लगता तुमने कभी प्रेम रूपी नदी में डुबकी नहीं लगाई। न तुमने कृष्ण से प्रेम किया।वो तो हमीं सब मूर्ख थीं जो उनके प्रेम में पड़कर चीटियों की तरफ गुड़ लिपटी रहती हैं।  


भाग-2

दूसरे पद में वे ऊधौ से कहती हैं- हमारे मन में बहुत सारी बातें हैं, जो हम कृष्ण से ही कह सकती थीं। वे तो आए  नहीं और किसी दूसरे से कह भी नहीं सकतीं। तो हमारे मन की बातें मन में ही रह गईं। हम सब कृष्ण के आने की प्रतीक्षा में दुःख सह रहीं थीं, लेकिन वे स्वयं तो आए नहीं उसके स्थान पर योग का संदेश भेज दिया। हमसब एक तो पहले से ही बहुत दुखी थीं, योग सन्देश ने आकर और बढ़ा दिया। जहाँ से हम कुछ अच्छे समाचार आने की आशा कर रही थीं, वहीं से ही योग की पूरी की पूरी धारा बही चली आई। अब हमसे धैर्य नहीं रखा जाता। उन्होंने तो मर्यादा ही तोड़ दी। मर्यादा तो यह होती है कि अगर आपको कोई प्रेम करता है तो आप भी बदले में उससे प्रेम करें।


 भाग-3

 तीसरे पद में वे ऊधौ से कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए हारिल पक्षी के समान हैं। जिस प्रकार हारिल पक्षी अपने  पंजों से लकड़ी को पकड़े रहता है और किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ता है, उसी प्रकार हमने कृष्ण को मन, कर्म, वचन से अपने हृदय में बसा रखा है। वे दिन-रात कृष्ण का ही नाम लेती रहती हैं।गोपियाँ आगे कहती हैं कि उन्हें योग कड़वी ककड़ी के समान लगती है। योग की जरूत उन लोगों को है, जिनको कृष्ण से प्रेम  नहीं है। जिनका मन भटकता रहता है। हमारा मन तो पहले ही कृष्ण में लगा हुआ है। इसलिए इसकी जरूरत हमें नहीं है।


भाग-4

चौथे पद में वे  व्यंग्य करती हुई कहती हैं कि तुम्हारे थोड़ा बोलते ही हम सारे समाचार समझ गईं थीं। कृष्ण ने राजनीति सीख ली है। वे चतुर तो पहले से ही थे। अब उन्होंने राजनीति के कुछ नियम भी सीख लिए हैं। पहले के लोग दूसरों की भलाई के लिए आगे आ जाते थे। अब लगता है हमारा मन वापस मिल जाएगा, जो कृष्ण जाते समय ले गए थे। लेकिन अब वे स्वयं पर ही अन्याय करने लगे हैं। कृष्ण राजधर्म तो यह कहता है कि प्रजा को किसी भी प्रकार से सताया न जाए। कहने का अर्थ यह है कि राजा का धर्म होता है प्रजा के दुखों को दूर करना न कि उन्हें दुःख देना।


Surdas ke pad Summary

Surdas ke pad Summary

धन्यवाद!

 

By hindi Bharti

Dr.Ajeet Bhartee M.A.hindi M.phile (hindi) P.hd.(hindi) CTET

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