ritikal ki visheshtaen
ritikal ki visheshtaen?
रीतिकाल की विशेषताएँ (उदाहरण सहित)
प्रश्न-रीतिकाल की विशेषताएँ उदाहरण सहित कीजिये।
अथवा
रीतिकाल की प्रवृत्तियों का वर्णन करते हुए उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर- हिंदी साहित्य के उत्तरकाल को ‘रीतिकाल’ के नाम भी जाना जाता है। इसका समय 1650 ई. से 1850 ई. (1700 वि. से 1900 वि. तक) तक माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘रीतिकाल’ नाम दिया है। आचार्य वामन ने ‘रीति’ को काव्य की ‘आत्मा’ माना है। अलंकार का अधिक प्रयोग होने के कारण मिश्र बंधुओं ने इस काल को ‘अलंकृत काल’ कहा है। रीतिकाल में श्रृंगार की प्रधानता के कारण विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे ‘श्रृंगार काल’ नाम दिया है। डॉ. राम कुमार वर्मा ने ‘कला-काल’ नाम दिया है। हिंदी साहित्य के ‘उत्तर-मध्यकाल’ को अधिकांश विद्धवानों ने ‘रीतिकाल’ नाम को मान्यता दी है।
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ उदाहरण सहित-
रीतिकाल के कवि किसी न किसी राजा के दरबार में रहते थे तो उनकी अधिकांश रचनाएँ उनकी झूठी प्रसंशा में लिखी गयी हैं। उन्होंने श्रृंगार और नारी सौन्दर्य का खूब चित्रण किया है। रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएँ उदाहरण सहित इस प्रकार हैं-
1.श्रृंगार की प्रधानता-
इस युग के कवियों ने अपनी रचनाओं में श्रृंगार का अधिक प्रयोग किया है। रीतिकाल के कवियों ने शृंगार का वर्णन खुलकर किया है। इसकी रचना करने में उन्होंने संकोच बिल्कुल नहीं किया है। रीतिकालीन कवियों ने दोनों पक्षों-संयोग और वियोग श्रृंगार का वर्णन किया है। बिहारी का एक उदाहरण-
“बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै, भौंहं हँसै, दैन कहै, नटि जाय”।
बिहारी का एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसमें नायक को सवेरे-सवेरे देखकर उसका मित्र हँसते हुए कहता है- उदाहरण-
“पलकु पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल।
आजु बने सो भली करी, भले बने हो लाल”।
2.रीति निरूपण-
रीतिकालीन कवियों की प्रमुख विशेषता है-रीति निरूपण अर्थात् लक्ष्ण ग्रंथों की रचना करना। इसी विशेषता के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल का नाम रीतिकाल रखा। संस्कृत काव्यशास्त्र हिंदी में रूपांतरित करने का काम रीतिकालीन आचार्यों द्वारा किया गया है। विभिन्न काव्यांगों के लक्ष्ण एवं उदाहरण देते हुए कई कवियों ने लक्ष्ण ग्रंथों की रचना की। सामान्य पाठकों को काव्यशास्त्र की जानकारी कराना तथा काव्यशास्त्र का प्रदर्शन करना ही इन ग्रंथों के रचियताओं का उद्देश्य रहा है। केशव की ‘कविप्रिया’, चिंतामणि की ‘कविकुल कल्पतरु’, ‘श्रृंगार मंजरी’, मतिराम की ‘ललित ललाम’ भूषण की ‘शिवराज भूषण’, देव की ‘रस विलास’ आदि ऐसी ही रीति निरूपक रचनानाएं हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन रीति ग्रंथकारों को आचार्य न मानकर कवि ही माना है। उनके अनुसार, “हिंदी के लक्ष्णग्रंथों की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकड़ों कवि हुए, वे आचार्य कोटि में नहीं आ सकते”।
3.संकुचित जीवन दृष्टि-
रीतिकालीन कवियों की जीवन दृष्टि बहतु संकुचित दिखाई पड़ती है। किसी महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वे काव्य रचना में प्रवृत्त नहीं हुए अपितु श्रृंगार-प्रधान काव्य लिखकर उन्होंने आश्रयदाता विलासी राजाओं का मनोरंजन मात्र किया। अधिकांश कवि नायिका के कटाक्ष कुशल नेत्रों, उन्नत उरोजों, लाल कपोलों, रस से भरे ओंठ एवं अन्य अंगों के सौन्दर्य का का चित्रण करण ही कवि अपना कर्म समझते रहे।
4.पांडित्य प्रदर्शन-
रीतिकालीन कवियों ने अपने पांडित्य प्रदर्शन को दिखाने के लिए ही कविताएँ लिखी हैं। इस युग के अधिकांश कवि किसी न किसी राजा या शासक के दरबार में रहकर कविताएँ लिखते थे। राजा अपने दरबार में कवियों का अपना पांडित्य दिखाने के लिए उनके बीच में प्रतियोगिता कराते थे। एक कवि दूसरे कवि को हराने के लिए कठिन काव्य पाठ करते थे, जो काव्य सामान्य जनता के समझ में ही नहीं आता था। जिससे उनका पांडित्य प्रदर्शन दिखाई देता है। कवि केशवदास ने भी कठिन काव्य लिखे जिसके कारण उन्हें कठिन कविता लिखने वाला प्रेत या भूत कहा जाता है।
5.नारी का चित्रण-
इस युग के कवियों का नारी के प्रति दृष्टिकोण भक्तिकाल और आधुनिक काल के कवियों की तरह अच्छा नहीं था। इस युग के कवियों ने नारी के शारीरिक अंगों का चित्रण अधिक किया है। कहने का मतलब ये है कि इन कवियों ने नारी को केवल भोग की वस्तु माना है। उनके अंदर के गुणों का चित्रण नहीं किया है। अर्थात् उंहोने उसके अन्य रूपों जैसे- माता, देवी, बहिन, कुशल गृहणी, भगिनी, पत्नी, दादी आदि का चित्रण नहीं किया है।
रीतिकालीन कवि नारी को पुरुष के आकर्षण का केंद्र एवं उसकी अंकशायिनी(जो स्त्री पुरुष के बगल या गोद में सोती है) मात्र समझते थे। देव कवि की यह उक्ति इस धारणा के समर्थन में- उदाहरण-
“कौन गुनै पुर बन नगर कामिनी एकै रीति,
देखत हरै विवेक कौं चित्त हरै कर प्रीति”।
6.आश्रय दाताओं की झूठी प्रसंशा-
रीतिकाल के अधिकांश कवि किसी न किसी राजा के दरबार में रहते थे। केशव, मतिराम, बिहारी, भूषण, देव, सूदन आदि कवि राजाओं के दरबार में रहते थे। कवि देव ने अपने आश्रयदाता भवानी सिंह के लिए ‘भवानी-विलास’ तथा सूदन ने भरतपुर के राजा सुजान सिंह की प्रसंशा में ‘सुजान चरित’ लिखा। कवि भूषण ने शिवाजी की प्रसंशा में ‘शिवराज भूषण’,शिव भवानी,’ तथा छत्रसाल बुंदेला की प्रसंशा में ‘छत्रसाल दशक’ की रचना की।
इस युग के कवि आश्रयदाताओं को खुश करने के लिए लगे रहते थे और कभी – कभी अपने प्रतिद्वंद्वी को निकलने में सफल हो जाते थे। इन कवियों के काव्य में वो विशेषता नहीं दिखाई दी जो भक्तिकाल के कवियों में थी।
7.आम जनता की उपेक्षा-
रीतिकाल के अधिकांश कवि विभिन्न राजाओं के दरबारों में रहते थे। केशव, बिहारी, भूषण, देव, मतिराम, सूदन आदि कवि भी विभिन्न राजाओं के आश्रय में रहते थे। ये कवि आश्रयदाताओं को खुश करने वाली कविताएँ लिखते रहते थे। कुछ तो सिर्फ राजाओं और शासकों की झूठी प्रसंशा करते रहते थे। जिसके कारण आम लोगों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते थे। उस समय के शासक के राज्य में क्या समस्याएँ थीं आम लोगों का जीवन कैसा था? इन कवियों ने उसका चित्रण नहीं किया है। इस तरह इस युग के कवियों ने आम जनता की उपेक्षा की है।
8.बहुज्ञाता एवं चमत्कार प्रदर्शन-
रीतिकालीन कवियों की कविताओं में बहुज्ञता का प्रदर्शन करने के साथ – साथ चमत्कार का भी प्रदर्शन करते थे। बिहारी जैसे कवियों ने अपने काव्य में पुराण, आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, नीतिशास्त्र, चित्रकला और काव्यशास्त्र की जानकारी दी है। आयुर्वेद की जानकारी का परिचय निम्न दोहे में है- उदाहरण-
“यह विनसत नग राखि कैं क्यों न सुजस जग लेहु,
जरी विषमज्वर ज्याइए आई सुदरसन देहु”
अब बात करते है रीतिकालीन कवियों के चमत्कार प्रदर्शन के लिए प्रायः अनुप्रास, यमक, श्लेष जैसे अलंकारों का सहारा लिया है। इस युग में चमत्कार प्रदर्शन को कवि का वास्तविक कर्म समझा जाने लगा था। बिहारी का दोहा-उदाहरण-
“मेरी भव बाधा हरौ राधा नागरि सोय,
जा तन की झॉंई परै स्यामु हरित दुति होय”।
9.प्रकृति का वर्णन-
रीतिकालीन कवियों ने प्रकृति का चित्रण उद्दीपन एवं अलंकार के रूप में किया है। इस युग के नायक और नायिका के सुख और दुःख में प्रकृति को भी उसी रूप में दिखाया है। सेनापति जैसे एक दो कवियों ने ही प्रकृति के मनोरम चित्र अंकित किये हैं। बिहारी, देव, मतिराम, आदि कवियों ने भी प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। सेनापति को ऋतु वर्णन में बहुत सफल हुए हैं। वर्षाकाल का एक चित्रण का उदाहरण-
“संपति उनय नए जलद सावन के,
चारिहु दिसान घुमरत भरे तोय कै”।
रीतिकालीन कवि देव का ‘वसंत वर्णन’ भी बहत सुंदर है-
“द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में,
देखि दीप दीपन में दीपत दिगंत है।
बीथिन में ब्रज में नबेलिन जात कैहूँ भांति,
बनन में, बागन में बगरयो बसंत है”।
इस युग के कवियों ने प्रकृति का सुंदर चित्रण तो किया है लेकिन जिस प्रकार का छायावादी कवियों ने प्रकृति का वर्णन किया है वैसा चित्रण रीतिकाल के कवियों में नहीं दिखाई देता है।
10.अश्लीलता का चित्रण-
दरबारी वातावरण एवं विलासितापूर्ण जीवन ने कवियों का नजरिया बदल दिया था। इन कवियों ने जीवन के कई पक्षों की ओर से अपनी दृष्टि हटाकर श्रृंगार तक सीमित कर लिया है। रीतिकाल के कुछ कवियों ने आश्रयदाताओं को खुश करने के लिए श्रृंगार रस के अश्लील चित्रण किये हैं। वे राजाओं को खुश करने के लिए नायिका के अश्लील वर्णन कर बैठते थे।
11.छंदों का प्रयोग-
रीतिकालीन कवियों ने अपनी रचनाओं में छंदों का अधिक प्रयोग करके कविता को कठिन बना दिया है। जैसे घनानंद की कविता छंदों की रसमाधुरी से ओतप्रोत है। उसमें प्राणों की संगीत और उनका हृदय पीड़ा से तार झंकृत है। इस युग के कवियों ने सवैया, कवित्त, त्रिभंगी, दोहा, चौपाई छंदों का प्रयोग अधिक किया है जो उनके विषय के लिए पूरी तरह उपयुक्त छंद थे। बिहारी ने दोहा जैसे छोटे छंद में भावों का समवेश किया है जैसे-
“सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर,
देखन में छोटे लगें घाव करैं गंभीर”।
12.ब्रज भाषा का प्रयोग-
भक्तिकाल में जो ब्रजभाषा कृष्ण काव्य तक सीमित रही लेकिन आगे चालकर रीतिकाल के कवियों ने इसे अपनी काव्य भाषा बनाया। लगभग 200 वर्षों तक इस भाषा का दबदबा रहा। सभी हिंदी क्षेत्रों के कवियों ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। मराठी क्षेत्र में भूषण ने, पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह ने, बुन्देली क्षेत्र (ओरछा) में केशव ने तथा राजस्थान में बिहारी ने ब्रजभाषा में अपनी रचनाएँ रचीं थीं।
रीतिकालीन ब्रजभाषा में एक ओर तो माधुर्य एवं नाद सौन्दर्य विद्यमान है तो दूसरी ओर उसमें आनुप्रसिकता एवं लाक्षणिकता होने से उसका सौन्दर्य दुगुना हो गया है।
13.अलंकार का प्रयोग-
इस युग के कवियों ने अपनी रचनाओं में अलंकार का खूब प्रयोग किया है। कवि अपनी कविता को सजाने के लिए अलंकारों से सजाते थे। इस युग के कवियों ने आश्रयदाताओं को खुश करने के लिए कृत्रिम अलंकारों का भी प्रयोग किया है। वे अपनी बुद्धि का लोहा मनवाने के लिए मजबूर करते थे। केशवदास का उदाहरण-
“जदपि सुजाति सुलछनी सुबरन सरस सुवृत।
भूषण बिनु न बिराजई कविता बनिता मित्त”।
अलंकार के पीछे दौड़ने के कारण कई जगहों पर केशव का काव्य विकृत हो गया है क्योंकि वहाँ अनुभूति प्रमुख न होकर अलंकार का चमत्कार ही प्रमुख है।
बिहारी के काव्य में एक ओर तो उत्प्रेक्षा का सौन्दर्य विद्यमान है तो दूसरी ओर यमक, श्लेष, अनुप्रास जैसे शाब्दिक चमत्कार की सृष्टि करते हुए अलंकार प्रयोग की कुशलता का परिचय दिया है। बिहारी की उत्प्रेक्षा का सुंदर उदाहरण-
“सोहत ओढैं पीत पीट स्याम सलोने गात,
मनौं नीलमणि सैल पर आतप परयौ प्रभात”।
14.मुक्तक-काव्य का चित्रण-
रीतिकाल के कवियों ने मुक्तक काव्य की रचना की और अपनी रूचि दिखाई है। राजा अपने दरबारों में कवियों की प्रतियोगिता कराते थे जिसके कारण प्रबंध काव्य नहीं लिखे गए। दरबारी वातावरण होने के कारण मुक्तक रचनाएँ ही उचित थीं क्योंकि राजा-महाराजाओं के पास इतना अवकाश कहाँ था कि वे प्रबंध काव्य को सुनकर उसकी तारीफ करते। कवि राजा-महाराजाओं को एक ही दोहा या छंद सुनकर उनका विश्वास जीत लेते थे।
केशव, बिहारी, देव, घनानंद, मतिराम, भूषण, भिखारीदास, बोधा, आलम, ठाकुर, पद्माकर, सेनापति आदि की रचनाओं से सम्पन्न रीतिकाल निश्चित रूप से हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण काल है।
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डॉ. अजीत भारती