बिहारी कि विशेषताएं
बिहारी कि विशेषताएं?
प्रश्न-बिहारी की प्रमुख विशेताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर- बिहारी रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं। उनका जीवनकाल 1595 ई. से लेकर 1663 ई. तक रहा है। उनकी एक मात्र प्रसिद्ध रचना का नाम ‘बिहारी सतसई’ है। जिसमें कुल 713 दोहे संकलित हैं।
उन्हें कम से कम शब्दों में अधिक भावों को समावेश करने की महारत हासिल है। अथवा “बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है”। बिहारी श्रृंगार के रससिद्ध कवि हैं। नारी, प्रकृति एवं सौन्दर्य के चतुर बिहारी की एकमात्र कृति ‘बिहारी सतसई’ का जितना मान-सम्मान हिंदी जगत में हुआ, उतना बहुत कम ग्रंथों में मिल पाता है। इनका एक – एक दोहा रत्न माना जाता है। बिहारी केवल कवि ही नहीं बल्कि बहुत बड़े ज्ञानी थे। हिंदी साहित्य के प्रसिद्द कवि बिहारी की विशेषताएं इस प्रकार हैं-
1.श्रृंगार रस की प्रधानता-
बिहारी का सतसई मूल रूप से श्रृंगार से भरा काव्य ग्रन्थ है। उन्होंने श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का प्रयोग किया है। नायिका के सौन्दर्य का सुंदर चित्रण किया है। साथ में नायक-नायिका की प्रेम क्रीडाओं, हाव-भाव का भी वर्णन किया है। उदाहरण-
“बरतस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह करैं भौंहनु हँसे देन कहै नटि जाय”।
2.भाषा की समास शक्ति-
बिहारी ने कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट करने के लिए समास शक्ति का प्रयोग किया है। वे बड़े-बड़े प्रसंगों को भी दोहे की दो पंक्तियों में शामिल करने में सफल हुए हैं। भरी राजसभा में नायक-नायिका बड़ी चालाकी से आँखों ही आँखों में बात कर लेते हैं, उसका एक उदाहरण-
“कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात,
भरे भौन में करत हैं नैनुन ही सब बात”।।
3.चमत्कार प्रदर्शन-
बिहारी जी अपने युग के अनुसार कविता में चमत्कार प्रदर्शित करने में कुशल हैं। यमक, श्लेष अलंकर का चमत्कार उनके कई दोहों में दिखाई देता है। जैसे इस दोहे में ‘कनक’ शब्द दो बार प्रयोग अलग-अलग अर्थों में करते हुए ‘यमक’ अलंकार का विधान किया है-उदाहरण
“कनक-कनक तै सौगुनी मादकता अधिकाय।
उहिं खायें बौराय इहिं पाएं ही बौराय”।।
इस शब्दालंकार के प्रयोग से बिहारी प्रायः दोहरे अर्थों का समावेश करके चमत्कार उत्पन्न करते हैं।
4.बहुज्ञता का प्रदर्शन-
बिहरी कवि ही नहीं बल्कि कई विषयों के जानकार थे। उनको गणित, आयुर्वेद, इतिहास, पुराण और ज्योतिष की अच्छी जानकारी थी। उन्होंने अपने दोहे में इन सभी विषयों का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए ज्योतिष ज्ञान की जानकारी निम्न ‘सोरठा छंद’ में दी है– उदाहरण-
“मंगल बिंदु सुरंग, मुख ससि केसर आड़ गुरु।
एक नारी लहि संग, रसमय किय लोचन जगत”।
(i) आयुर्वेद की जानकारी-
बिहारी ने अपने कई दोहों में आयुर्वेद की जानकारी होने का परिचय भी दिया है। वे जानते थे कि विषम बुखार का उपचार सुदर्शन चूर्ण है। जिसकी जानकारी इस ‘श्लेष’ अलंकार में है- उदाहरण-
“यह बिनसत नग राखि कैं क्यों न सुजस जग लेहु।
जरी विषम जुर ज्याइए आय सुदरसन देहु”।
सखी (दूती) श्रीकृष्ण से कहती है कि इस विनष्ट होते हुए स्त्री-रत्न की रक्षा करके आप संसार में यश क्यों नहीं प्राप्त करते? यह तो विषम बुखार से पीड़ित है आप आकर सुंदर दर्शन रूपी चूरन दे दें।
इसी प्रकार नपुंसकता को दूर करने के लिए वहां ‘पारा’ देने की बात भी कही गई है- उदाहरण-
“बहु धनु लै अहसानु कै पारो देत सराहि।
बैद वधू हंसि भेद सौं रही नाह मुंह चाहि”।
वैद्य जी ने नपुंसकता को दूर करने के लिए बहुत सारा धन उस व्यक्ति से ऐंठ लिया और ऊपर से अहसान करते हुए ‘पारा’ दिया।
(ii) राजीनीति की जानकारी-
बिहारी ने श्रृंगार वर्णन के अंतर्गत राजनीति की जानकारी का उपयोग भी किया है। राज्य के अंगों की बात उन्होंने इस दोहे में कही है। चतुर राजा अपने सहायकों की पद वृद्धि करके सुशासन स्थापित करता है-उदाहरण-
“अपने अंग के जानि कैं जोबन नृपति प्रवीन।
तन मन नैन नितम्ब कौ बड़ो इजाफा कीन”।
यौवन रूपी राजा ने अपना सहायक समझकर नायिका के स्तन, नेत्र, नितम्ब और मन की चतुराई में बहुत वृद्धि कर दी है।
वे यह भी बताते हैं कि यदि सेना का हरावल दस्ता कमजोर हो तो मुख्य सेना पर अचानक विपत्ति आ पड़ती है- उदाहरण-
“जुरे दुहुनि के दृग झमकि रुके न झीनै चीर।
हलुकी फ़ौज हरौलु ज्यों परत गोल पर भीर”।।
(iii) ज्योतिष की जानकारी-
बिहारी दरबारी कवि थे और जयपुर (आमेर) ज्योतिष का प्रसिद्ध केंद्र था। ज्योतिष से संबंधित अनेक ‘योगो’ का वर्णन बिहारी के दोहों में है। बिहारी को ज्योतिष की बड़ी अच्छी जानकारी थी। राजयोग प्रकरण का उल्लेख निम्न दोहे में है- उदाहरण-
“सनि कज्जल चख-झख लगन उपज्यो सुदनि सनेह।
क्यों न नृपति ह्वै भोगवै लहि सुदेस सब देह”।।
(iv) नीतिशास्त्र की जानकारी-
बिहारी सतसई में नीति के अनेक दोहे हैं, जो उनकी नीतिशास्त्र की जानकारी का प्रामाणिक परिचय देते हैं। वे जानते हैं कि आज इस दुनिया में दुष्टों को पूजा जाता है, भले व्यक्तियों का त्रिस्कर होता है- उदाहरण-
“बसै बुराई जासु तन ताही को सनमानु।
भलौ भलौ कहि छोड़िए खोटे ग्रह जप दानु”।
(v) इतिहास पुराण की जानकारी-
बिहारी ने कहीं – कहीं पर इतिहास – पुराण के ज्ञान का भी परिचय दिया है। उन्हें महाभारत के उस प्रसंग की जानकारी है जिसमें बताया गया है कि दुर्योधन को जलस्थ्म्भन क्रिया आती थी जिसके प्रभाव से वह सरोवर में जा छिपा और जल से अप्रभावित रहा- उदाहरण-
“बिरह बिधा जल पर्स बिन बसियत मो मन-ताल।
कछु जानत जल थंभ बिधि दुरजोधन लौं लाल”।
(vi) गणित की जानकारी-
बिहारी ने अपने दोहे में गणित की जानकारी का प्रयोग किया है। लेकिन एक-दो स्थानों पर गणित के सामान्य ज्ञान को देखकर यह कहना ठीक नहीं है कि बिहारी बहुत बड़े गणितज्ञ थे। वे जानते थे कि अंक के आगे बिंदी लगा देने पर अंक दस गुना हो जाता है, किन्तु स्त्री के मस्तक पर बिंदी लगा देने से उसका मूल्य अगणित गुना बढ़ जाता है- उदाहरण-
“कहत सबै बेंदी दएं आंकु दस गुनो होतु।
तिय लिलार बेंदी दएं अगनित बढ़तु उदोतु”।
5. सरस प्रसंगों का चित्रण-
बिहारी ने जीवन के सरस प्रसंगों का वर्णन बहुत सुंदर ढंग से किया है। उनके दोहों को पढ़कर प्रत्येक व्यक्ति आनंदित होता है। ऐसा ही एक दृश्य देखिए- उदाहरण-
“मैं मिसहा सोयो समुझि मुंह चुम्यो ढिंग जाइ।
हंस्यो खिस्यानी गल गह्वो रही गरे लपटाइ”।
नायक सोने का बहाना किये हुए लेटा था। नायिका ने उसे सोता जानकार उसका मुख चूम लिया कि तभी नायक हँस पड़ा और शर्म से नायिका नायक के गले में लिपट गई।
6. प्रकृति का चित्रण-
बिहारी ने प्रकृति का आलंबन रूप में वर्णन करके अनेक मार्मिक दोहे लिखे हैं, जिनसे प्रकृति का साकार चित्र उपस्थित हो जाता है। गर्मी की ऋतु का यह वर्णन देखिए- उदाहरण-
“कहलाने एकत बसत अहि, मयूर, मृग बाघ।
जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ”।
गर्मी की प्रचंडता से व्याकुल होकर सर्प और मोर, हिरन और बाघ एक स्थान पर बैठे हैं, लगता है इस भयंकर ग्रीष्म ऋतु ने संसार को तपोवन के समान राग द्वेष से रहित कर दिया है।
7. वियोग वर्णन-
बिहारी ने संयोग श्रृंगार के साथ-साथ वियोग श्रृंगार का भी सुंदर चित्र अंकित किया है। वियोग की अतिश्योंक्ति के कुछ चित्र- उदाहरण-
“कहा कहौं बाकी दसा हरि प्रानन के ईस।
बिरह ज्वाल जरिबौ लखैं मरिबो भयौ असीस”।
सखी नायक श्रीकृष्ण से नायिका की विरह दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे प्राणेश तुम्हारी विरह ज्वाला में जलती हुई उस नायिका की मार्मिक दशा किसी की देखी नहीं जाती अब तो मरना उसके लिए आशीष बन गया है।
8. विरह ताप की अतिशयता-
नायिका विरह ताप मैं इतनी जल रही है कि गुलाब जल उसके शरीर का स्पर्श भी नहीं कर पाता और बीच में ही भाप बनकर उड़ जाता है- उदाहरण-
“औंधाई सीसी सुलखि विरह बरनि बिललात।
बिच ही सूखि गुलाबु गौ छींटौ हुई न गात”।
9. हाव-अनुभव का चित्रण-
नायिका की श्रृंगारिका चेष्टाएँ, जो जान बूझकर की जाती हैं, हाव कहलाती हैं ‘विलास’ नामक हाव का चित्रण निम्न दोहे में है- उदाहरण-
“भौंह ऊंचै आंचर उलटि मोरि मोरि मुंह मोरि।
नीठि- नीठि भीतर गई डीठि – डीठि सौं जारि”।
नायिका बड़ी चतुराई से भौंह ऊँची कर आँचल को उलटकर तथा मुख मोड़कर बड़े प्रेम से नायक की दृष्टि से अपनी दृष्टि मिलाकर भीतर चली गई।
10. नारी का चित्रण-
बिहारी ने नारी का सजीव चित्रण किया है। बिहारी के नारी चित्रण का सबसे प्रमुख आधार सौन्दर्य-वर्णन है। उन्होंने नारी को सौन्दर्य की मूर्ति, प्रेमिका और नायिका के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने नायिका के पैर से लेकर सिर तक बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। जो पढ़ने वालों को आकर्षित करती है। बिहारी ने नारी मन की बातें और शारीरिक हाव-भावों से खूबसूरती को प्रकट किया है। संकोच, मुस्कान, लज्जा, आँखों से इशारे करना और कटाक्ष मारना उनके नारी चित्रण का मुख्य हिस्सा है। उदाहरण के लिए एक प्रसिद्ध दोहे में नायक-नायिका की आँखों की भाषा और बातचीत का वर्णन है-उदाहरण-
“कहत, नटत, रीझत, खिजत, मिलत, खिलत, लजियात भरे भुवन में करत हैं, नैनन ही सौं बात।।”
11. कम शब्दों में ज्यादा कहना-
रीतिकाल के महान कवि बिहारी अपनी अनूठी जादूगरी अर्थात् ‘गागर में सागर भरने‘ की कला के लिए जाने जाते हैं। वे कम शब्दों में विस्तृत भाव और दृश्य चित्रित करने में माहिर थे। उनके दोहों के बारे में कहा जाता है-उदाहरण-
“सतसइया के दोहे ज्यों नावक के तीर,
देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर” ।
12. ब्रजभाषा का प्रयोग-
बिहारी ने अपनी रचना में ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी रचना ‘बिहारी सतसई’ में भी ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा सरल और कोमल है। उनकी ब्रजभाषा भावों के अनुकूल है। उनकी मुख्य भाषा ब्रज है उसके बाद भी उसमें बुन्देली, खड़ीबोली, पूर्वी हिंदी और फारसी के भी सुंदर शब्दों का प्रयोग किया है। भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए मुहावरों का प्रयोग किया है। उनकी भाषा इतनी जीवंत है कि उसके द्वारा लिखा गया एक-एक दोहा आँखों के सामने चित्र के रूप में दिखाई देने लगता है।
अंत में यही कह सकते हैं कि बिहारी एक ऊँचे दर्जे के कवि हैं। वे एक सफल श्रृंगार के रस सिद्ध कवि हैं। वे रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं। वैसे उनकी कविताओं में श्रृंगार रस की अधिकता है। बिहारी का कलापक्ष भी बहुत मजबूत है। उनको कई विषयों की जानकारी थी। उन्होंने साफ-सुथरी ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनके प्रत्येक दोहे में कोई न कोई अलंकार जरुर है। छंद की दृष्टि से उन्होंने अधिकतर दोहा लिखा है, किन्तु कुछ सोरठे भी लिखे हैं। अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विभावना, विरोधाभास आदि सभी अलंकार बिहारी के दोहों में उपलब्ध हो जाते हैं। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण बिहारी रीतिकाल के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि सिद्ध हुए हैं।
उन्होंने भले ही अपने जीवन में एक ही रचना ‘बिहारी सतसई’ रची हो लेकिन उसने उन्हें अम्र कर दिया। हिंदी जगत उनके साहित्यिक योगदान को कभी नहीं भूल पाएगा।
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डॉ. अजीत भारती