प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी
प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी?
प्रश्न-2. प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी पर प्रकाश डालिए?
अथवा
प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी की विशेषताएँ बताइए?
उत्तर-प्रेमचंद युगीन हिंदी कहानी (सन् 1916 ई. से 1936 ई.)
भूमिका-
कहानी के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद के आने से नए युग शुरुआत हुई। प्रसाद की कहानियों में भावना की प्रधानता, शैली में कविता, ऐतिहासिकता, कौतूहल की प्रधानता एवं मानव-मन के आन्तरिक संघर्ष का चित्रण है। पुरस्कार, ममता, छाया, आकाश-दीप, आँधी आदि प्रसाद जी की प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
प्रेमचंद को हिंदी कहानी का युगप्रवर्तक कहा जाता है। इन्हीं के नाम पर इस काल का नाम प्रेमचंद युग रखा गया। पहले प्रेमचंद ‘नवाबराय’ के नाम से ‘उर्दू’ में लिखते थे, उर्दू में लिखा उनका कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ सन् 1907 ई. में प्रकाशित हुआ था। जिसे अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया था। हिंदी में वे प्रेमचंद के नाम से लिखते थे। उनकी हिंदी की पहली कहानी ‘पंच परमेश्वर’ सन् 1916 ई. में प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी ‘कफ़न’ सन् 1936 ई. में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने लगभग 300 से अधिक कहानियाँ लिखी थीं। उनकी सभी कहानियां ‘मानसरोवर’ के आठ खण्डों में प्रकाशित हैं।
प्रेमचंद की कहानियों में कई विषय दिखाई देते हैं। उनकी कहानियाँ अपने आसपास के जीवन से जुडी हुई हैं। उनकी अधिकांश कहानियों का विषय ग्रामीण जीवन से लिया गया है लेकिन कुछ कहानियाँ कस्बे की जिंदगी, स्कूल, कॉलेज आदि हैं। उनके पात्र हर, धर्म, वर्ग और जाति के हैं। कोई हिन्दू तो कोई मुसलमान है। कोई किसान है तो कोई विद्यार्थी है। उन्होंने अपनी कहानियों में विभिन्न समस्याओं को उठाया है। जमीदारों के द्वारा किसानों का शोषण की समस्या, सूदखोरों के शोषण से पिसते ग्रामीणों की समस्या, छुआछूत की समस्या, अन्धविश्वास एवं रूढ़ि, भ्रष्टचार, व्यक्तिगत जीवन की समस्याएँ, संयुक्त परिवार की समस्या आदि।
प्रेमचंद की कहानियाँ घटना-प्रधान हैं और उनकी भाषा जनसाधारण की व्यवहारिक भाषा है। पूस की रात, पंच परमेश्वर, मन्त्र, ईदगाह, परीक्षा, प्रेरणा, सवा सेर गेहूँ, सुजान भगत, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआँ, लाटरी, नमक का दरोगा, बूढी काकी, कफ़न आदि उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं। उनकी पहले वाली कहानियाँ आदर्शवादी हैं और बाद में लिखी गई यथार्थवादी कहानियाँ हैं।
प्रसाद एवं प्रेमचंद के अतिरिक्त चतुरसेन शास्त्री, पंडित विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, भगवती चरण बाजपेयी आदि इस युग के प्रमुख कहानीकार हैं।
पंडित विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक जी की पहली कहानी ‘रक्षाबंधन’ है। उनकी कहानियों का विषय प्रायः सामाजिक समस्याओं जैसे दहेज़ प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह एवं अंधविश्वास से जादा हुआ है। ताई, रक्षाबंधन, विधवा आदि उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
सुदर्शन की कहानियाँ सुधारवादी हैं। उनकी प्रमुख कहानियाँ हार की जीत, कमल की बेटी, पत्थरों का सौदागर, दो मित्र आदि हैं।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऐतिहासिक विषयों पर कहानियाँ लिखी हैं। अम्बपालिका, रूठी रानी, पन्नाधाय, भिक्षुराज आदि हैं।
पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने सामाजिक शोषण, अनाचार एवं कुरीतियों के प्रति आक्रोश व्यक्त किया है। शैतान मंडली, बलात्कार, चाकलेट, इन्द्रधनुष आदि उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं।
प्रेमचंद युग में कहानी ने अपने स्वरुप को संवारने एवं निखारने का काम किया है। इस काल की कहानियों में पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक का चित्रण प्रमुख रूप से हुआ है। व्यक्ति चरित्र एवं नारी को इस काल में प्रमुखता दी जाने लगी थी तथा शैली एवं शिल्प की दृष्टि से कहानी प्रौढ़ता प्राप्त कर रही थी। भाषा की दृष्टि से भी इस युग की कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। इस काल की कहानियों में लोकमंगल और लोकप्रियता की विशेषता शामिल है।
प्रेमचंद युगीन कहानी की प्रमुख विशेषताएँ-
1.यथार्थवाद-
इस युग की कहानियाँ जीवन की वास्तविक समस्याओं से सीधे जुड़ी होती हैं- गरीबी, शोषण, भूख, किसान-मजदूर की स्थिति, स्त्री-पीड़ा को वाणी प्रदान की है।
2.सामाज सुधार-
इस युग की कहानी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार का माध्यम बनी। रूढ़ियों, कुरीतियों और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई गई। जैसे- प्रेमचंद की ‘कफ़न, पंचपरमेश्वर’, विश्वम्भरनाथ कौशिक की ‘रक्षाबंधन’ आदि।
3.ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण-
प्रेमचंद और अन्य रचनाकारों ने गाँव के किसानों, खेतिहर मजदूरों, ग्रामीण संघर्ष और दुख-दर्द को केंद्र में रखा। जैसे- प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ सवा सेर गेहूँ, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ आदि।
4.चरित्र- चित्रण की सजीवता-
इस युग के पात्र साधारण लोग होते हैं-किसान, स्त्रियाँ, बूढ़े, मजदूर, निम्नवर्गीय लोग। लेखक उनके मनोविज्ञान को गहराई से प्रस्तुत करते हैं।
5.सरल और प्रभावी भाषा-
भाषा में खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग हुआ, जो आम लोगों के करीब ले जाती है। मुहावरे-लोकोक्तियाँ कहानी को जीवन्त बनाती हैं। इस युग के लेखकों ने आम बोलचाल भाषा को अपनाया है। जिससे कहानी में वास्तविकता झलक दिखी देती है।
6.मानवीय मूल्य और संवेदनाएँ-
प्रेम, करुणा, त्याग, संघर्ष, आत्मसम्मान और मानवता इस युग की कहानियों के मूल भाव हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘परीक्षा’ सुदर्शन की ‘हार की जीत’ आदि है।
निष्कर्ष-
1916 से 1936 तक का प्रेमचंद युग हिंदी कहानी का स्वर्णिम काल है। इस समय कहानी मनोरंजन से आगे बढ़कर समाज की आवाज बनी। प्रेमचंद ने कहानी को जन-जीवन से जोड़ा और यथार्थवाद की दिशा दी, जिसके कारण उनका समय हिंदी कहानी का आदर्श और आधारस्तंभ माना जाता है।
प्रेमचंद युगीन के प्रमुख कहानीकार एवं प्रमुख कहानियाँ-
1-प्रेमचंद- कफ़न, माता का मंदिर, नशा।
2-विश्वम्भरनाथ कौशिक- रक्षाबंधन, ताई, विधवा, विद्रोही।
3-आचार्य चतुरसेन शास्त्री- सिंहगढ़ विजय, सुखमय जीवन।
4-पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’– दोजख की आग, चिंगारियां।
5-सुभद्राकुमारी चौहान- बिखरे मोती, उन्मादिनी संग्रह।
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प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ-
कफन- गरीबी, शोषण और मानवीय संवेदना का विकृति-रूप
पूस की रात- किसान जीवन की असहनीय पीड़ा
पंच परमेश्वर- न्याय और कर्तव्य की विजय
ईदगाह- बाल मनोविज्ञान और त्याग
बड़े घर की बेटी- नारी-सम्मान और परिवारिक मूल्य
प्रेमचंद युग और हिंदी कहानी का विकास
परिचय-
हिंदी साहित्य के इतिहास में 1918 से 1936 तक का कालखंड ‘प्रेमचंद युग‘ के नाम से विख्यात है। यह युग हिंदी कहानी के विकास में एक क्रांतिकारी मोड़ साबित हुआ। प्रेमचंद को ‘कहानी सम्राट‘ की उपाधि दी जाती है, क्योंकि उन्होंने न केवल कहानी को एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित किया, बल्कि उसे सामाजिक यथार्थ और जन-जीवन से जोड़कर एक नई दिशा प्रदान की। इस युग में कहानी मनोरंजन का साधन मात्र न रहकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन गई।
ऐतिहासिक एवं सामाजिक संदर्भ-
इस युग का उदय ऐसे समय हुआ जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्षरत था। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम पर था। सामाजिक स्तर पर जाति-प्रथा, स्त्री-शिक्षा, गरीबी, जमींदारी प्रथा जैसी समस्याएँ व्याप्त थीं। साहित्य में भारतेंदु युग की रोमांटिक भावनाएँ अब यथार्थ के धरातल पर उतरने लगी थीं। इसी पृष्ठभूमि में प्रेमचंद ने साहित्य को ‘जीवन की आलोचना‘ (क्रिटिसिज्म ऑफ लाइफ) मानते हुए यथार्थवादी कहानियों की नींव रखी।
प्रेमचंद युगीन कहानी की विशेषताएँ-
- यथार्थवादी चित्रण- प्रेमचंद ने कहानी को स्वप्नलोक से निकालकर धरती पर उतारा। उनकी कहानियाँ गाँवों की मिट्टी, किसानों के संघर्ष, गरीबी, शोषण और सामाजिक विषमताओं के सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। ‘पूस की रात‘, ‘कफन‘, ‘बड़े घर की बेटी‘, ‘दो बैलों की कथा‘ जैसी कहानियों में जिस यथार्थ का चित्रण मिलता है, वह पाठक को सीधे भारतीय ग्रामीण जीवन से परिचित कराता है। उन्होंने भारतीय गाँव को साहित्य के केन्द्र में लाकर एक नई दृष्टि दी।
- सामाजिक सरोकार एवं आदर्शोन्मुख यथार्थवाद-
प्रेमचंद का साहित्य केवल समस्याओं का चित्रण नहीं, बल्कि उनके समाधान की तलाश भी है। उन्होंने ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद‘ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अनुसार साहित्यकार को यथार्थ का चित्रण करते हुए आदर्श की ओर भी संकेत करना चाहिए। ‘ईदगाह‘ में हामिद की दादी के प्रति त्यागभावना, ‘सवा सेर गेहूँ‘ में ईमानदारी, ‘नमक का दारोगा‘ में कर्तव्यनिष्ठा जैसे मूल्यों का उल्लेख इसी आदर्शवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
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मानवीय संवेदना का चित्रण-
प्रेमचंद की कहानियों में मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। वे अपने पात्रों के दुःख-दर्द, आशा-आकांक्षाओं को इतनी गहराई से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक स्वयं को उनसे जुड़ा हुआ पाता है। ‘कफन‘ कहानी में पिता-पुत्र की निर्ममता के बीच छिपी मजबूरी और विवशता का चित्रण इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
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स्त्री जीवन का मार्मिक अंकन-
प्रेमचंद ने स्त्री जीवन की समस्याओं और संघर्षों को कहानी का महत्वपूर्ण विषय बनाया। ‘नारी की कमजोरी‘, ‘बड़े घर की बेटी‘, ‘मंत्र‘ जैसी कहानियों में उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-समस्या, पर्दा-प्रथा, दहेज आदि विषयों को उठाया। उनकी नारी पात्र प्रायः त्याग, धैर्य और संघर्ष की प्रतिमूर्ति होती हैं, परन्तु कहीं-कहीं वे विद्रोही स्वर भी उठाती हैं।
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राष्ट्रीय चेतना एवं स्वतंत्रता संग्राम-
इस समय की कई कहानियों में राष्ट्रीय चेतना के दर्शन होते हैं। ‘शतरंज के खिलाड़ी‘ में भारतीय शासकों की विलासिता और अंग्रेजों की कूटनीति का व्यंग्यात्मक चित्रण है। ‘मंत्र‘ कहानी में राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल है। गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव भी उनकी कहानियों में स्पष्ट दिखाई देता है।
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भाषा एवं शैली-
इस काल में प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को सहज, सरल और व्यावहारिक खड़ी बोली दी। उनकी भाषा में उर्दू के लफ्ज़ों का समावेश होते हुए भी वह आम जनता की समझ में आने वाली थी। वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ उन्होंने संवादों को कहानी की गति और पात्रों के चरित्र-चित्रण में महत्वपूर्ण स्थान दिया। उनके संवाद स्वाभाविक, सजीव और पात्रानुकूल होते थे।
प्रमुख कहानीकार एवं उनकी विशेषताएँ-
- मुंशी प्रेमचंद (1880-1936):
प्रेमचंद इस युग के स्तंभ थे। उन्होंने लगभग 300 कहानियाँ लिखीं, जो ‘मानसरोवर‘ के आठ भागों में संकलित हैं। उनकी प्रमुख कहानियाँ हैं: ‘कफन‘, ‘पूस की रात‘, ‘ईदगाह‘, ‘बड़े घर की बेटी‘, ‘दो बैलों की कथा‘, ‘नमक का दारोगा‘, ‘शतरंज के खिलाड़ी‘, ‘सवा सेर गेहूँ‘ आदि। उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और आदर्शवाद का अद्भुत समन्वय मिलता है।
- जयशंकर प्रसाद (1889-1937):
प्रसाद मुख्यतः छायावादी कवि और नाटककार थे, किन्तु उन्होंने कहानी विधा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘आकाशदीप‘, ‘छाया‘, ‘प्रतिध्वनि‘ उनके कहानी संग्रह हैं। उनकी कहानियाँ मनोवैज्ञानिकता, कल्पनाशीलता और गहरी संवेदनशीलता से परिपूर्ण हैं। ‘मधुआ‘, ‘गुंडा‘, ‘पुरस्कार‘ जैसी कहानियों में उन्होंने मानव मन के जटिल भावों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है।
- विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक‘ (1891-1945):
वे प्रेमचंद के समकालीन थे और उनकी कहानियों में सामाजिक समस्याओं का चित्रण मिलता है। उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन के विविध पहलुओं को अपनी कहानियों का विषय बनाया।
- सुदर्शन (1896-1967)- उनकी कहानियों में हास्य-व्यंग्य और नाटकीयता का समावेश है। ‘शहर का कुत्ता‘, ‘उसने कहा था‘ जैसी कहानियों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया।
कहानी की विषय-वस्तु एवं प्रवृत्तियाँ-
प्रेमचंद युग की कहानियों की विषय-वस्तु अत्यंत विस्तृत थी:
ग्रामीण जीवन: किसानों का संघर्ष, सामंती शोषण, गरीबी और प्राकृतिक विपदाएँ।
नारी जीवन: स्त्री-शिक्षा, विधवा-समस्या, दहेज, पारिवारिक उत्पीड़न।
मध्यवर्गीय जीवन: आर्थिक संकट, नैतिक मूल्यों का ह्रास, पारिवारिक संबंध।
राष्ट्रीय आंदोलन: स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रभक्ति, बलिदान की भावना।
नैतिक मूल्य: ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सद्भावना।
शिल्पगत विशेषताएँ-
कथानक की संरचना-
इस युग की कहानियों में कथानक सुसंगठित और उद्देश्यपूर्ण होता था। प्रायः कहानी का आरंभ, विकास और अंत स्पष्ट होता था।
चरित्र-चित्रण-
पात्रों का चरित्र-चित्रण यथार्थपरक और सजीव था। पात्र सामाजिक परिवेश के अनुरूप विकसित होते थे।
वातावरण निर्माण-
गाँव, शहर, घर, बाजार आदि के वातावरण का चित्रण इतना सटीक होता था कि पाठक स्वयं को उस वातावरण में खो जाता था।
संवाद योजना-
संवाद पात्रों के सामाजिक स्तर, शिक्षा और परिस्थिति के अनुरूप होते थे। संवाद कहानी को गति प्रदान करते थे।
भाषा-शैली-
भाषा सरल, सहज और व्यावहारिक थी। वर्णनात्मक और संवादात्मक शैली का सुंदर समन्वय मिलता था।
प्रेमचंद युग की सीमाएँ एवं आलोचना-
प्रेमचंद युग की कहानियों की कुछ सीमाएँ भी रहीं:
कुछ आलोचकों के अनुसार, प्रेमचंद की कहानियों में कहीं-कहीं भावुकता और आदर्शवाद का अतिरेक दिखाई देता है।
कुछ कहानियों में उपदेशात्मकता का पुट आ जाता है।
मनोवैज्ञानिक गहराई का कुछ अभाव देखने को मिलता है।
स्त्री पात्र प्रायः त्याग और बलिदान की मूर्ति बनकर रह जाती हैं, उनमें विद्रोह का स्वर कमजोर है।
प्रेमचंद युग का ऐतिहासिक महत्व-
कहानी विधा का स्थापनाकाल- इस युग में कहानी एक स्वतंत्र और परिपक्व साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुई।
यथार्थवाद की नींव-
प्रेमचंद ने हिंदी कहानी में यथार्थवाद की ठोस नींव रखी, जिस पर आगे चलकर प्रगतिशील और नई कहानी आंदोलन खड़े हुए।
सामाजिक दायित्वबोध-
साहित्य के सामाजिक दायित्व की अवधारणा को मजबूती मिली।
भाषा का लोकतंत्रीकरण-
साहित्यिक भाषा को जनसाधारण की भाषा के निकट लाने का श्रेय इस युग को जाता है।
परंपरा का निर्माण- प्रेमचंद ने हिंदी कहानी की एक ऐसी परंपरा स्थापित की जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दी।
निष्कर्ष-
इस युग में हिंदी कहानी का स्वर्णिम काल था। इस युग ने कहानी को एक सशक्त, प्रभावशाली और जन-जीवन से जुड़ी हुई विधा बनाया। प्रेमचंद के यथार्थवाद, आदर्शोन्मुख दृष्टिकोण और मानवीय संवेदना ने न केवल अपने समय के साहित्य को प्रभावित किया, बल्कि आज भी वे कहानीकारों के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। उन्होंने कहानी को ‘कला-कला के लिए‘ के सिद्धांत से निकालकर ‘कला-जीवन के लिए‘ के सिद्धांत से जोड़ा। प्रेमचंद युग की कहानियाँ आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुई हैं, क्योंकि उनमें चित्रित सामाजिक विषमताएँ, शोषण के स्वरूप और मानवीय संबंधों की जटिलताएँ काफी हद तक आज भी विद्यमान हैं।
इस प्रकार, प्रेमचंद युग ने हिंदी कहानी को एक ऐसी दिशा प्रदान की जिसमें सौंदर्यबोध और सामाजिक सरोकार का सुंदर समन्वय था। यह युग हिंदी कहानी के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने आने वाली कहानी की सभी प्रवृत्तियों को प्रभावित किया।
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डॉ. अजीत भारती