प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी

प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी

प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी (सन् 1936 ई. से 1950 ई.)

प्रश्न-प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी का परिचय दीजिए।

अथवा

प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर- सन् 1936 ई. से 1950 ई. तक के समय को हिंदी कथा जगत में प्रेमचंदोत्तर कहानी काल के नाम से जाना जाता है।

हिंदी कहानी के विकास में प्रेमचंद का स्थान बहुत बड़ा है। उन्होंने हिंदी कहानी को सामाजिक चेतना, यथार्थ और मानवीय संवेदना प्रदान की। किंतु प्रेमचंद के बाद देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दशा में बड़ा परिवर्तन आया। आजादी के बाद उद्योग, शहरीकरण, लोकतंत्र, बदलती जीवन-शैली, मध्यवर्ग और लोगों की मानसिक सोच ने साहित्य को नया रूप दिया।

इसी परिवर्तनशील वातावरण में प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी का जन्म हुआ, जिसने हिंदी कहानी को आधुनिक और बहुआयामी बना दिया।

प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी की विशेषताएँ-

1.यथार्थवाद

                 प्रेमचंदोत्तर कहानीकारों ने समाज को उसके वास्तविक रूप को प्रस्तुत किया है। अब कहानी केवल गाँव, किसान और जमींदारी तक सीमित नहीं रही। शहर, महानगर, कारखाने, कार्यालय, बाजार, राजनीतिक व्यवस्था, बेरोज़गारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, जातिवाद, वर्ग-संघर्ष और आर्थिक भेद जैसे विषय कहानी का हिस्सा बने।

2.मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

                इस काल के लेखकों ने मनुष्य के मन में चलने वाली बातों पर कहानियाँ लिखी हैं। कहानी के पात्रों की भावनाएँ, अकेलापन, भय, प्रेम, घृणा, कुंठा, असुरक्षा, आत्म-संघर्ष और मानसिक द्वंद्व चित्रित किये हैं।

3.चरित्र को महत्व

                   प्रेमचंदोत्तर कहानी में लेखकों ने कथानक से अधिक चरित्र पर ध्यान दिया है। इनकी कहानियों में घटनाओं को नहीं, बल्कि पात्रों की संवेदनाओं और अनुभवों को सही ढंग से दिखया गया है।

4.उपदेश का त्याग

                         प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में नैतिक शिक्षा और सुधारवादी पर उपदेश दिए हैं, परंतु प्रेमचंदोत्तर कहानी में लेखक उपदेश नहीं देते हैं। वे सच्चाई को प्रकट करते हैं और पाठक स्वयं निष्कर्ष निकालता है। जिससे कहानी बहुत अच्छी बन जाती है।

5.नई कहानी आंदोलन

                       1950 के बाद ‘नई कहानी आंदोलन’ ने हिंदी कहानी को नई दिशा दी। मोहन राकेश, कमलेश्वर, यशपाल, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, अज्ञेय जैसे लेखकों ने आम आदमी के जीवन, उसकी विफलताओं, पीड़ा, असंतोष और टूटन को दिखाया है।

6.शहरी जीवन और मध्यवर्गीय

                                        प्रेमचंदोत्तर युग के कहानीकारों के कहानी का केंद्र शहर और मध्यमवर्ग रहा। नौकरी की चिंता, आर्थिक दबाव, पारिवारिक तनाव, वैवाहिक असंतोष, अकेलापन, सामाजिक दिखावा और आधुनिक जीवन की समस्याएँ कहानी के मुख्य विषय रहे।

7.नारी-विमर्श-

                     स्त्री को अब सहनशील नहीं, बल्कि संघर्षशील के रूप में प्रस्तुत किया गया है। स्त्री की स्वतंत्रता, पहचान, शोषण, आत्मसम्मान और समान अधिकारों की माँग कहानी में दिखाई देती है।

8.दलित-विमर्श

                   इस युग के लेखकों ने अपनी कहानियों में दलित, जाति-पांति, शोषण और सामाजिक अन्याय की असलियत को उजागर किया है।

9.आधुनिक जीवन-बोध

                              इस यगु की कहानियों में मनुष्य की पहचान, जीवन का अर्थ, अकेलापन, असुरक्षा जैसी समस्याओं को प्रस्तुत किया गया है। कहानी आधुनिक व्यक्ति की मानसिक समस्याओं को प्रकट करती है।

10.कई विचारधाराओं का समावेश

                                           प्रेमचंदोत्तर युग की कहानियों में यथार्थवाद, प्रगतिवाद, मनोविश्लेषण, अस्तित्ववाद, आदिवासी, अल्पसंख्यक और श्रमिक वर्ग की आवाज़ भी कहानी में शामिल हुई है।

11.भाषा और शैली में नवीनता

                                      इस युग की कहानियों की भाषा सरल और सहज दिखाई देती है। जिससे इस काल की कहानियाँ अधिक समृद्ध और विकसित हुईं।

12.संक्षिप्तता का प्रभाव

                               इस युग की कहानी का आकार छोटा हुआ है लेकिन भावनात्मक गहराई बढ़ गई है। इस समय की कहानियाँ छोटी होती गईं, लेकिन उसका प्रभाव बहुत गहरा होता है। इस काल के लेखकों ने कम से कम शब्दों में बड़ी बात कहने की कला विकसित की है।

13.प्रयोगवाद और नई कथा-

                                       तकनीकफ्लैशबैक, कोलाज शैली(जिसमें दृश्य तत्वों को मिलाकर एक नया चित्र बनाया जाता है जो एक संदेश या विचार व्यक्त करता है), प्रतीकात्मकता और खुला अंत-इन सबने कहानी को आधुनिक रूप दिया है।

14.निष्कर्ष

               अंत में यही कहा जा सकता है कि प्रेमचंदोत्तर युग के लेखकों ने हिंदी कहानी के विषय, शैली और देखने का तरीका-तीनों स्तरों पर बहुत परिवर्तन किया है।

इस काल के लेखकों ने प्रेम, रोमांस एवं यौन समस्याओं को लेकर भी कहानियाँ लिखी हैं। प्रेमचंदोत्तर हिंदी कहानी विषय, भाषा, कथा-शैली, मनोविज्ञान, सामाजिक सरोकार, शहरी जीवन, स्त्री-दलित विमर्श और आधुनिक दृष्टियों के कारण बहुत समृद्ध हुई है।

इस युग के कहानीकारों ने मनुष्य और समाज दोनों की सच्चाइयों को ईमानदारी से प्रस्तुत कर हिंदी कहानी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।

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डॉ.अजीत भारती

 

By hindi Bharti

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