अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश? ऐसा गद्यांश जिसे छात्र परीक्षा हाल में बैठकर प्रश्न-पत्र में पहली बार पढ़ता है और पढ़कर दिए गए निर्देशों के अनुसार उत्तर देता है। इसके द्वारा विद्यार्थीयों का मानसिक और तार्किक शक्ति को जाँचा जाता है।


प्रश्न-1. विद्यार्थियों के मन में अक्सर  पहला प्रश्न ये आता है कि अपठित गद्यांश उनके पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाता है ?

उत्तर- अपठित गद्यांश के द्वारा विद्यार्थियों की व्यक्तिगत योग्यता और बौद्धिक चिंतन को परखा जाता है।


प्रश्न-2. फिर उनके मन में दूसरा प्रश्न यह होता है कि अपठित गद्यांश किन विषयों पर पूछे जाते हैं।

उत्तर- प्रायः अपठित गद्यांश कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र एवं किसी विशेष लेखों से पूछे जाते हैं।


प्रश्न-3. छात्रों का तीसरा सवाल  होता है कि इससे उनको क्या लाभ होगा ?

उत्तर- अपठित गद्यांश का लगातार अभ्यास करने से विद्यार्थियों के बैद्धिक चिंतन में वृद्धि और मानसिक स्तर का विकास होता है।

अर्थात् उनके सोचने-समझने और तर्क शक्ति आदि का विकास होता है।


अपठित गद्यांश


प्रश्न-4. उनका चौथा प्रश्न रहता है कि अपठित गद्यांश से कितने तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं ?

उत्तर- इसमें दो तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं-

1-गद्यांश के आधार पर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

2-गद्यांश के आधार पर दिए गए विकल्पों का सही चुनाव कीजिए।


प्रश्न-5. अपठित गद्यांश से क्या आशय है?

उत्तर-अपठित का अर्थ है- जो पढ़ा गया न हो।

गद्यांश का अर्थ होता है- गद्य का अंश(भाग)।

अर्थात् गद्यांश का वह अंश, जो पहले न पढ़ा गया हो, अपठित गद्यांश कहलाता है।


  • अपठित गद्यांश को थोडा संक्षेप में भी समझ लेंते हैं

अपठित गद्यांश Syllabus का तो भाग होते हैं। लेकिन ये विद्यार्थियों के Syllabus की पाठ्यपुस्तक से नहीं पूछे जाते हैं। हैं। चूँकि ये अपठित होते हैं इसलिए उपन्यास, कहानी, निबंध आदि से लिए जाते हैं, जो विद्यर्थियों को पहलीबार पढ़ने के लिए दिए जाते  हैं और उन्हें गद्यांश को ध्यान से पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर लिखने को कहा जाता है और अगर प्रश्न बहुविकल्पी (Objective) हैं, तो सही विकल्प को चुनकर लिखने के लिए कहा जाता है। तब विद्यार्थी सही विकल्प चुनकर लिखता है।


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प्रश्न-6. अपठित गद्यांश के उद्देश्य क्या हैं ?

उत्तर-  इसके निम्न उद्देश्य हैं-

1- इसके  वाचन और पठन कौशलों का विकास होता है।

2- विद्यार्थीयों में विषय के भाव को समझने की बुद्धि का विकास होता है।

3- अर्थ ग्रहण करने की क्षमता में वृद्धि होती है।

4- विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति क्षमता के मूल्यांकन में मदद मिलती है।

5- पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त अन्य साहित्यिक गतिविधियों के प्रति रूचि बढती है


प्रश्न-7. अपठित गद्यांश से संबंधित प्रायः किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं ?

उत्तर-  निम्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं-

1– अपठित गद्यांश का उचित शीर्षक चयन करना।

2-  गद्यांश के भावार्थ से संबंधित प्रश्न पूछा जाता है।

3-  गद्यांश में दिए गए उपसर्ग, प्रत्यय, समास, विलोम और पर्यायवाची आदि प्रश्न पूछे जाते हैं।

4-  गद्यांश में दिए गए शब्दों के अर्थ से संबंधित प्रश्न भी आते हैं।

5-  गद्यांश पर आधारित ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर उसी गद्यांश में छिपा रहता है।


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प्रश्न-8. अपठित गद्यांश का उत्तर लिखते समय किन-किन  बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

उत्तर- उत्तर लिखते या चुनते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1- सबसे पहले गद्यांश को दो से तीन बार पूरे मनोयोग से पढ़ना चाहिए।

2- गद्यांश के मूल भाव को ठीक से पढ़कर समझ लेना चाहिए।

3- अपठित गद्यांश के कठिन शब्दों को बार-बार पढ़कर उसके अर्थ को समझ लेना चाहिए।

4- शब्दों के उपसर्ग, प्रत्यय, समास विलोम, पर्यायवाची आदि पूछे जाने पर सार्थक और सही विकल्प चुनना चाहिए।

5- अगर प्रश्न समझ में न आ रहा हो, तो उसे बार–बार पढ़कर समझ लेना चाहिए।

6- सभी विकल्पों को ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए।

7- विकल्प का चुनाव गद्यांश के आधार पर ही करना चाहिए।

8- दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प खोजने का प्रयास करना चाहिए।


चलो अब उदाहरण से समझते हैं-

  • निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर सही विकल्प चुनकर लिखिए-

विद्यार्थी जीवन ही वह समय है जिसमें बच्चों के चरित्र, व्यवहार तथा आचरण को जैसा चाहे वैसा ही रूप दिया जा सकता है। यह अवस्था भावी वृक्ष की उस कोमल शाखा की भाँति है जिसे जिधर चाहे मोड़ा जा सकता है। पूर्णत: विकसित वृक्ष की शाखाओं को मोड़ना संभव नहीं है। उन्हें मोड़ने का प्रयास करने पर वे टूट तो सकती हैं, पर मुड़ नहीं सकती। छात्रावस्था उस श्वेत चादर की तरह होती है

       जिसमें जैसा प्रभाव डालना हो, डाला जा सकता है। सफ़ेद चादर पर एक बार जो रंग चढ़ गया, सो चढ़ गया; फिर से वह पूर्वावस्था को प्राप्त नहीं हो सकती। इसीलिए प्राचीन काल से ही विद्यार्थी-जीवन के महत्व को स्वीकार किया गया। इसी अवस्था में सुसंस्कार और सद्वृत्तियाँ पोषित की जा सकती हैं। इसीलिए प्राचीन समय में बालक को घर से दूर गुरुकुल में रहकर कठोर अनुशासन का पालन करना होता था।


प्रश्न-1. छात्रों को गुरुकुल क्यों छोड़ा जाता था ?

(i) घर में संस्कार देना संभव नहीं होता है।

(ii) विद्यार्थी जीवन का महत्व समझे।

(iii) वह संस्कारवान बन सके।

(iv) कठोर अनुशासन का पालन करना सीखे।

उत्तर-(iv) कठोर अनुशासन का पालन करना सीखे।


प्रश्न-2. मनुष्य के व्यवहार को सुधारने का श्रेष्ठ समय कौनसा है ?

(i) विद्यार्थी जीवन

(ii) बाल जीवन

(iii) प्रौढ़ अवस्था

(iv) इनमें से कोई नहीं

उत्तर- (i) विद्यार्थी जीवन


प्रश्न-3. छात्रावस्था सफ़ेद चादर के समान है, क्योंकि-

(i) छात्र प्रभावित होने के लिए तैयार रहते हैं।

(ii) डाला गया प्रभाव बदला नहीं जा सकता है।

(iii) जैसा प्रभाव डालना हो, डाला जा सकता है।

(iv) कठोरता से प्रभाव डाला जा सकता है।

उत्तर-(iii) जैसा प्रभाव डालना हो, डाला जा सकता है।


प्रश्न-4. छात्रावस्था की तुलना विकसित पेड़ से करना क्यों ठीक नहीं है-

(i) पूर्ण विकसित पेड़ की शाखा टूटती नहीं है। 

(ii) पूर्ण विकसित वृक्ष की शाखा मुड़ नहीं पाती।

(iii) पूर्ण विकसित वृक्ष की शाखा मुड़ जाती है।

(iv) पूर्ण विकसित वृक्ष की शाखा कोमल होती है।

उत्तर-(ii) पूर्ण विकसित वृक्ष की शाखा मुड़ नहीं पाती।


प्रश्न-5. गुरुकुल में संज्ञा का भेद बताइए-

(i) जातिवाचक।

(ii) व्यक्तिवाचक।

(iii) भाववाचक।

(iv) इनमें से सभी।

उत्तर-(i) जातिवाचक


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डॉ. अजीत भारती 

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